Friday, July 25, 2025

ग्राम पंचायत में एक नई सुबह: माहवारी पर बात और धरती का श्रृंगार किया #ssstsssamiti #rsssamitingo

राहत समर्पण सेवा समिति के सयुक्त सचिव व स्व. श्रीमती शकुंतला तिवारी स्मृति सेवा समिति के संस्थापक पंडित कार्तिकेय तिवारी ने राहत शक्ति अभियान मे 
ग्राम पंचायत भवन में एक नई सुबह: माहवारी पर बात की और धरती का श्रृंगार किया।

दिनांक: 18/07/2025
स्थान: ग्राम पंचायत खिरवा न. 2 व जमुआनी कला, विजयराघवगढ  जिला कटनी म.प्र.

यह दिन मेरे लिए अविस्मरणीय बन गया है। सुबह जब मैं ग्राम पंचायत भवन के लिए निकल रही थी, तो मन में एक अजीब सी हलचल, एक उत्साह और थोड़ी सी घबराहट थी। आज मुझे अपने ही गांव की बहनों, माताओं और किशोरियों से एक ऐसे विषय पर बात करनी थी, जिस पर अक्सर हमारे समाज में खामोशी की एक मोटी चादर पड़ी रहती है - मासिक धर्म या माहवारी। इसके साथ ही, हमने मिलकर अपने पंचायत भवन के प्रांगण को हरा-भरा करने का भी संकल्प लिया था। आज का दिन दोहरी खुशी लेकर आया - एक तरफ जहाँ हमने महिलाओं के स्वास्थ्य और सम्मान की बात की, वहीं दूसरी ओर हमने प्रकृति के प्रति अपने कर्तव्य का भी निर्वहन किया।

चुप्पी तोड़ो, स्वस्थ रहो: माहवारी पर सार्थक संवाद

हमारे गांव का पंचायत भवन आज किसी सरकारी दफ्तर जैसा नहीं, बल्कि एक अपने घर के आंगन जैसा लग रहा था, जहाँ लगभग 40-50 महिलाएँ और किशोरियाँ इकट्ठा हुई थीं। शुरुआत में सबके चेहरों पर एक झिझक और संकोच साफ झलक रहा था। विषय ही कुछ ऐसा था। मैंने अपनी बात एक छोटे से सवाल से शुरू की, "हम महिलाएँ घर-परिवार, खेत-खलिहान, हर जिम्मेदारी को कितनी सहजता से निभाती हैं, लेकिन जब अपने ही शरीर से जुड़ी एक बहुत ही स्वाभाविक प्रक्रिया की बात आती है, तो हम चुप क्यों हो जाती हैं?"

बस, मेरा इतना कहना था कि धीरे-धीरे खामोशी की बर्फ पिघलने लगी। मैंने उन्हें समझाया कि मासिक धर्म कोई बीमारी या अभिशाप नहीं, बल्कि एक महिला के स्वस्थ होने का प्रतीक है। यह प्रकृति का एक वरदान है जो उसे माँ बनने का सौभाग्य प्रदान करता है। हमने इस दौरान स्वच्छता के महत्व पर विस्तार से बात की। मैंने उन्हें बताया कि कैसे माहवारी के दिनों में साफ-सफाई न रखने से कई तरह के संक्रमण और बीमारियाँ हो सकती हैं, जो आगे चलकर गंभीर रूप ले सकती हैं।

मैंने महिलाओं को सैनिटरी पैड के इस्तेमाल के फायदे बताए और यह भी समझाया कि अगर वे पैड नहीं खरीद सकतीं, तो घर पर सूती कपड़े को अच्छी तरह धोकर और धूप में सुखाकर कैसे इस्तेमाल कर सकती हैं। धूप में सुखाना क्यों जरूरी है, यह समझाते हुए मैंने उन्हें बताया कि नमी में कीटाणु पनपते हैं, जो संक्रमण का मुख्य कारण बनते हैं। हमने उन मिथकों और भ्रांतियों पर भी खुलकर चर्चा की जो सदियों से हमारे समाज में गहरी जड़ें जमाए हुए हैं - जैसे अचार न छूना, मंदिर में प्रवेश न करना, या खुद को अशुद्ध समझना।
मुझे यह देखकर बहुत खुशी हुई कि धीरे-धीरे महिलाएँ खुलने लगीं। कुछ ने अपने अनुभव साझा किए, तो कुछ ने अपनी शंकाएं और सवाल पूछे। एक किशोरी ने हिम्मत करके पूछा, "दीदी, पेट में इतना दर्द क्यों होता है?" मैंने उसे और बाकी सभी को इस दौरान होने वाले शारीरिक बदलावों और दर्द से निपटने के घरेलू उपायों के बारे में बताया। यह संवाद सिर्फ एक जानकारी सत्र नहीं था, बल्कि एक-दूसरे को समझने और सहारा देने का một अवसर बन गया था। उस दो घंटे की बातचीत ने न केवल महिलाओं को वैज्ञानिक जानकारी दी, बल्कि उन्हें एक आत्मविश्वास भी दिया कि अपने स्वास्थ्य के बारे में बात करना उनका अधिकार है।

धरती का श्रृंगार: एक पौधा भविष्य के नाम

मासिक धर्म पर सार्थक चर्चा के बाद हम सब पंचायत भवन के प्रांगण में इकट्ठा हुए। यहाँ हमारा दूसरा महत्वपूर्ण कार्य इंतजार कर रहा था - वृक्षारोपण। जिस तरह हमने महिलाओं के स्वास्थ्य और जीवन को पोषित करने की बात की थी, उसी तरह अब हम अपनी धरती माँ को भी पोषित करने जा रहे थे।
हमने मिलकर आम, नीम, पीपल और अमरूद जैसे कई फलदार और छायादार पौधे लगाने के लिए गड्ढे खोदे। हर महिला के चेहरे पर एक अलग ही चमक थी। ऐसा लग रहा था मानो वे सिर्फ एक पौधा नहीं, बल्कि अपने गांव के लिए एक स्वस्थ और हरे-भरे भविष्य का बीज रोप रही हों। मैंने उन्हें बताया कि ये पेड़ हमें सिर्फ फल और छाया ही नहीं देंगे, बल्कि ये हमारी हवा को शुद्ध करेंगे, पानी को सहेजेंगे और इस धरती को और भी खूबसूरत बनाएंगे।
जब हम सब मिलकर मिट्टी में पौधे लगा रहे थे और उन्हें पानी दे रहे थे, तो एक अजीब सा सुकून महसूस हो रहा था। उन पौधों में हमें अपने बच्चों का भविष्य नजर आ रहा था। हमने हर पौधे की देखभाल की जिम्मेदारी भी आपस में बांटी। यह सिर्फ एक सरकारी कार्यक्रम नहीं था, बल्कि एक सामूहिक संकल्प था, अपने गांव को, अपने परिवेश को बेहतर बनाने का।

निष्कर्ष: एक नई सोच, एक नई शुरुआत

आज का दिन सचमुच में बदलाव का दिन था। हमने ग्राम पंचायत भवन की चारदीवारी के अंदर उस चुप्पी को तोड़ा जो महिलाओं को उनके स्वास्थ्य के प्रति लापरवाह बनाती है और उन्हें हीन भावना से भर देती है। और फिर उसी भवन के प्रांगण में हमने प्रकृति के साथ अपने रिश्ते को मजबूत किया।

यह कार्यक्रम इस बात का प्रमाण है कि जब एक समुदाय एकजुट होता है, तो सकारात्मक बदलाव की लहर पैदा होती है। माहवारी पर बात करना उतना ही स्वाभाविक है जितना कि सांस लेना और वृक्षारोपण करना उतना ही जरूरी है जितना कि जीवन जीना। आज हमने न केवल महिलाओं को शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ रहने की जानकारी दी, बल्कि हमने मिलकर यह भी संदेश दिया कि एक स्वस्थ समाज का निर्माण तभी हो सकता है, जब हम महिलाओं के सम्मान और प्रकृति के संरक्षण, दोनों को बराबर महत्व दें।

मुझे उम्मीद है कि आज जो हमने बीज बोए हैं - चाहे वो जानकारी के बीज हों या पेड़ों के - वे जल्द ही अंकुरित होंगे और हमारा गांव एक स्वस्थ, सशक्त और हरे-भरे भविष्य की ओर अग्रसर होगा। आज की शाम जब मैं घर लौट रही थी, तो मेरे मन में घबराहट नहीं, बल्कि एक गहरी शांति और संतोष का भाव था। यह संतोष कुछ अच्छा करने का, अपने समाज के लिए एक छोटा सा योगदान देने का था।
कार्यक्रम मे हमारे साथ rssamitingo के अध्यक्ष शारदा प्रसाद साहू, वालिंटियर डायरेक्टर छवि ताम्रकार ssstsssamiti के सयुक्त सचिव शोभित तिवारी हरीश जी मौजूद रहे।

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